शनिवार, 18 सितंबर 2010

एक छन्द : त्यागने वाले मिले ।

रस रंग की बात

करो न अली !

बस रूप को

माँगने वाले मिले ।

सुख जानने वाले

अनेक मिले .

दुख देखकर

भागने वाले मिले ।

सुमनोँ को मिला

जहाँ गन्ध पराग

वहाँ कण्टक

मतवाले मिले ।

कितनी बड़ी त्रासदी

है जग मेँ

अपनाकर

त्यागने वाले मिले ।

46 टिप्‍पणियां:

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

कितना कठोर हो पर है तो यही सत्य जगत का।

kshama ने कहा…

कितनी बड़ी त्रासदी

है जग मेँ

अपनाकर

त्यागने वाले मिले ।
Aah! Ye to sach me sab se badee trasadi hai...

राणा प्रताप सिंह (Rana Pratap Singh) ने कहा…

बहुत बढ़िया|
जीवन का सत्य वर्णित करती पंक्तियाँ है|
ब्रह्माण्ड

anupama's sukrity ! ने कहा…

मन की व्यथा -कटु सत्य कह कर वर्णित की है -
शुभकामनाएं.

संगीता स्वरुप ( गीत ) ने कहा…

कितनी बड़ी त्रासदी

है जग मेँ

अपनाकर

त्यागने वाले मिले

कटु लेकिन सत्य ...मन पर छाप छोडती रचना

Majaal ने कहा…

दूंदना चाहा बच्चों में बचपन मजाल,
सारे बच्चे मगर सयाने मिले ...

सुन्दर रचना ...

वीना ने कहा…

कितनी बड़ी त्रासदी

है जग मेँ

अपनाकर

त्यागने वाले मिले

बहुत सुंदर रचना

Anand ने कहा…

bahut Khoobsoorat rachna,
Kind of continuation of previous one, true and beautiful

पी.सी.गोदियाल ने कहा…

बेहद उम्दा रचना, यही सच है !

बेचैन आत्मा ने कहा…

जीवन के कटु सत्य की सरल,सुंदर अभिव्यक्ति।

Girijesh Rao ने कहा…

अली या आली?

सम्वेदना के स्वर ने कहा…

पण्डित जी… आपकी कविता को पढने का अनुभव एक स्वर्गिक आनंद से कम नहीं होता... वह कविता, जो आज लुप्त हो गई है, आपके द्वार पर मिल जाती है... और इस कविता में जिस व्यथा का वर्णन है, उसका अनुभव उसी को हो सकता है जो इस व्यथा यात्रा से गुज़रा हो... बस मौन रहकर उसी यात्रा पर हूँ...

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) ने कहा…

रस रंग की बात

करो न अली !

बस रूप को

माँगने वाले मिले ।
--


बहुत सुन्दर रचना!

सम्वेदना के स्वर ने कहा…

@गिरिजेश रावः
अलि भी और आलि भीः
.
अलि! इन भोली बातों को
अब कैसे भला छिपाऊँ!
इस आँख-मिचौनी से मैं
कह? कब तक जी बहलाऊँ? (सुमित्रा नंदन पंत)
.
आलि री मेरे नैना बान पड़ी
कद की ठाड़ी पन्थ निहारूँ
अपने भवन खड़ी
आलि री मेरे नैना बान पड़ी (मीरा बाई)

Girijesh Rao ने कहा…

@ सम्वेदना के स्वर
अरुणेश जी ने 'अलि' नहीं 'अली' लिखा है। ध्यान से देखिए।
:)

सम्वेदना के स्वर ने कहा…

अली या आली???
.
अलि भी आलि भी... :)

अरुणेश मिश्र ने कहा…

श्री गिरिजेश राव जी !
अलि = भौँरा
अली = सखी . सहेली
राजपाल हिन्दी शब्दकोश
डाँ 0 हरदेव बाहरी ।

Arvind Mishra ने कहा…

जब रूप और यौवन दे ही दिया
तो उसे कोई सराहने वाला भी दे .....

Saumya ने कहा…

कितनी बड़ी त्रासदी
है जग मेँ
अपनाकर
त्यागने वाले मिले

bauhat umda...and so very true!!!

monali ने कहा…

पुष्पों की पहचान भी कंटकों से होती है... बेहद सुंदर रचना...

अनामिका की सदायें ...... ने कहा…

सत्य वचन.

मनोज कुमार ने कहा…

शब्द सामर्थ्य, भाव-सम्प्रेषण, संगीतात्मकता, लयात्मकता की दृष्टि से कविता अत्युत्तम हैं। जीवन के कटु यथार्थ को चित्रित करती कविता नए आयाम स्पर्श कर रही है।

बहुत अच्छी प्रस्तुति। हार्दिक शुभकामनाएं!

काव्य के हेतु (कारण अथवा साधन), परशुराम राय, द्वारा “मनोज” पर, पढिए!

मो सम कौन ? ने कहा…

"सुमनोँ को मिला

जहाँ गन्ध पराग

वहाँ कण्टक

मतवाले मिले ।"

बहुत खूबसूरत पंक्तियां,
आभार स्वीकारें।

Girijesh Rao ने कहा…

'सखी' अर्थ में प्रयुक्त होना तो दूर, क्लासिक संस्कृत में 'अली' शब्द ही नहीं है। लेकिन 'अलि' और 'आली' दोनों हैं। देसज में भी 'अली' का ऐसा प्रयोग मेरी दृष्टि में नहीं आया है। मैंने ध्यान उसी आधार पर दिलाया था।
वैसे कवि कई बार ऐसी छूटें ले लेता है - आली को अली कहना तो कुछ भी नहीं। अंग्रेजी की एक पुरानी कविता में जो कि हमलोगों को बारहवीं में पढ़ाई जाती थी, तुक और वर्णविन्यास मिलाने के लिए कवि ने एक अर्थहीन शब्द ही गढ़ दिया था।

वर्तनी के चक्कर में कविता को भूल ही गया। प्रवाह दर्शनीय है और जीवन का एक गुरु आयाम सरल शब्दों में व्यक्त किया गया है। आभार।

अरुणेश मिश्र ने कहा…

श्री गिरिजेश राव जी !
अली शब्द हिन्दी मे सदैव सखी . सहेली के लिए ही स्वीकृत हैं ।
देखेँ - लोकभारती प्रामाणिक हिन्दी कोश
- आचार्य रामचन्द्र वर्म्मा ।
किसी साहित्यकार ने अली शब्द का प्रयोग अभी तक नही किया है . जैसा कि आप ने लिखा है ।
अली कली ही सोँ बिंध्यो आगे कौन हवाल ।
महाकवि बिहारी

अरुणेश मिश्र ने कहा…

श्री गिरिजेश राव जी !
अली शब्द हिन्दी मे सदैव सखी . सहेली के लिए ही स्वीकृत हैं ।
देखेँ - लोकभारती प्रामाणिक हिन्दी कोश
- आचार्य रामचन्द्र वर्म्मा ।
किसी साहित्यकार ने अली शब्द का प्रयोग अभी तक नही किया है . जैसा कि आप ने लिखा है ।
अली कली ही सोँ बिंध्यो आगे कौन हवाल ।
महाकवि बिहारी
कृपया अली शब्द की व्युत्पत्ति एवं हिन्दी के अन्य कोश भी दँखेँ ।

Girijesh Rao ने कहा…

"अली कली ही सोँ बिंध्यो आगे कौन हवाल।" में अली का प्रयोग भौंरे के अर्थ में हुआ है न कि सखी के अर्थ में जो कि संस्कृत से ही आया है। अलि > अली।

मैंने यह कहा है कि "'सखी' अर्थ में प्रयुक्त होना तो दूर, क्लासिक संस्कृत में 'अली' शब्द ही नहीं है। लेकिन 'अलि' और 'आली' दोनों हैं। देसज में भी 'अली' का ऐसा प्रयोग मेरी दृष्टि में नहीं आया है।"
:)

अजय कुमार ने कहा…

एक कटु सत्य

वाणी गीत ने कहा…

त्रासदी तो है ..!

संगीता पुरी ने कहा…

सच है !!

राजभाषा हिंदी ने कहा…

बहुत अच्छी प्रस्तुति। राजभाषा हिन्दी के प्रचार-प्रसार में आपका योगदान सराहनीय है।
समझ का फेर, राजभाषा हिन्दी पर संगीता स्वरूप की लघुकथा, पधारें

विरेन्द्र सिंह चौहान ने कहा…

कितनी बड़ी त्रासदी
है जग मेँ
अपनाकर
त्यागने वाले मिले



सत्य लिखा है आपने ..
बार-२ पढ़ने को मन करता है .

इस बेहद उम्दा प्रस्तुति के लिए
आपका आभार ......

Apanatva ने कहा…

gahree baat......
duaa hai ise anubhav se sabhee bache .
sunder abhivykti .

मिसिर ने कहा…

सुन्दर छंद , जीवन यथार्थ में पगे शब्द ,
प्रवाहमयी ,सरस धारा !
सर्वथा सराहनीय रचना !

Vivek VK Jain ने कहा…

satya kaha.......aur really a nice poem....
कितनी बड़ी त्रासदी

है जग मेँ

अपनाकर

त्यागने वाले मिले
ye to jagat ktha h....

ज्योत्स्ना पाण्डेय ने कहा…

बहुत तगाडा कटाक्ष....
अलि, अलीऔर आली पर हुई चर्चा भी पसंद आई...

शुभकामनाएं...

Prem Farrukhabadi ने कहा…

कितनी बड़ी त्रासदी

है जग मेँ

अपनाकर

त्यागने वाले मिले ।

bahut khoob kaha aapne.badhai!!

सुनीता शानू ने कहा…

हकीकत बयां करती रचना। बहुत सुन्दर।
धन्यवाद।

ज्योति सिंह ने कहा…

poori rachna hi sundar hai kis shabd ,bhav ko kahoon vishesh .
ek geet yaad aa raha hai -
kuchh reet jagat ki aesi hai ,seeta bhi yahan badnaam hui ........

usha rai ने कहा…

रस रंग की बात
करो न अली !
बस रूप को
माँगने वाले मिले ।!!!
सहज सच्चे मन की व्यथा का मासूम चित्रण !!! दर्द को थपकी देता सा !!! आभार !
--

Dr. shyam gupta ने कहा…

मेरे विचार से -श्री गिरिजेश राव जी की बात सही है, अली का अर्थ भौंरा ही है, अलि. आली = सखी.
" नहिं पराग नहिं मधुर मधु, नहिं विकास यहि काल। अली कली सों ही विंध्यो आगे कौन हवाल।"

--वैसे ”न करो अली के’ स्थान पर "करो न आली" ज्यादा सटीक रहेगा.....यूं तो वैसे भी यह कोई कविता ही नहीं है।
--भई इसमें त्रासदी क्या है---वास्तव में तो अपनाकर ही त्यागा जाता है, जो बहुत कठिन है
जिसे मिला ही नहीं वो क्या त्यागेगा--जरा अपने मूलभूत सत्य तो देखिये--
१--...तेन त्यक्तेन भुन्झीथा..=उसे त्याग के साथ भोगना चाहिये।--ईशोपनिषद।
२--"विध्या सह अविध्या यस्तत वेदोभय सह।
अविध्यायां म्रित्युं तीर्य्वा विध्यायां अम्रतंम्नुश्ते॥"
=अविध्या( संसार, कर्म, भोग आदि) व विध्या (ईश्वरीय ग्यान, धर्म ,दर्शन’) को साथ साथ जानना/अपनाना चाहिये। संसार के ग्यान,भोग आदि कर्तव्यों द्वारा म्रत्यु को पारकर विध्या( त्याग, तप ध्यान आदि ईश्वरीय भाव) से अमरता को प्राप्त करना चाहिये।

Mrs. Asha Joglekar ने कहा…

रसरंग की बात करो न सखि
रूप के चाहने वाले ही मिले ।
बहुत सुंदर । अरुणेश जी ।

'उदय' ने कहा…

... saarthak rachanaa !!!

Prem Farrukhabadi ने कहा…

Tulsi das ji ne bhagwan Ram ki stuti 14 panktiyon ki likhi hai jis mein 13 vi pankti ke ant mein Ali shabd ka prayog hua hai. Gaur karne se pata chalta hai ki mishra ji apni jagah par Ali shabd sahi hain.

अरुणेश मिश्र ने कहा…

श्री गिरिजेश राव जी !
यह हिन्दी की रचना है ; संस्कृत की नही । अत: आप अली शब्द का हिन्दी कोश मे अर्थ देखेँ । वैसे तो अली का हिन्दी . संस्कृत . उर्दू एवं अन्यान्य भाषाओं मेँ भिन्न भिन्न अर्थ हैं ।
अपने भ्रम को दूर करने के लिए किसी भी प्रकाशन का हिन्दी शब्द कोश अवश्य देखेँ ; जहाँ आपको अली का अर्थ सखी . सहेली ही मिलेगा । आप अन्य भाषाविदोँ से भी जानकारी प्राप्त करेँ ।
डाँ 0 श्याम गुप्त जी !
किसी भी रचना का मूल्यांकन सब अपने विवेकानुसार करते हैँ ; अत: आपकी टिप्पणी रचना को व्याख्या के नये आयाम देती है ।

vidrohiavyav ने कहा…

bahut sundar. Jeevan ka yathaarth bata diya aapne.

-Mayank