शुक्रवार, 26 फ़रवरी 2010

ओ मेरे युगचारण !

बिना पुलिस के
कैसे संभव है
होली
दीवाली
ईद
मोहर्रम
कुम्भ
चुनाव
मंत्रीजी का भाषण
माननीयोँ का शहर
या गाँव मे निकलना


राशन
आपदा राहत
मनरेगा की मजदूरी का वितरण
जुलूस
धरना -प्रदर्शन
के आयोजन
बिना पुलिस के
कैसे हो पाएंगे ?
ओ मेरे देश बोलो !
इस सडाँध भरी राजनीति को हम सब
कितने दिन और ढो पाएँगे ?

अधिकारी कहते हैं
हम रिश्वत मे छोटे नोटों की गड्डियाँ नही लेते
कौन घण्टोँ गिने
पाँच या हजार के नोटोँ की
गड्डियाँ लाइये
आनन फानन मे
काम करवाइये
इस हाथ दीजिए
उस हाथ दीजिए

राजनेता कहते है
नोट नही
प्रकार मे रिश्वत दीजिए
फाइव स्टार मे
काम का परिणाम लीजिए
बाबू अब भी नोटोँ और
बोतलोँ मे फँसे है
हम सब लोकतन्त्र के
समारोह मे बहुत
गहरे तक धँसे हैँ

ऐसे मे
माननीय न्यायालय
और आमजनता
खोज रही है
नक्सलवाद के कारण
इसका किस तरह से
उत्तर दे पाएगे चारण
ओ मेरे युगचारण !!