शनिवार, 11 सितंबर 2010

एक छंद : विसंगति

जिसको यहाँ कंचन

रूप मिला

उसको प्रिय गेह

मिला ही नही ।

सुमनो को मिला

रस गंध पराग .

परन्तु सनेह

मिला ही नही ।

भ्रमरो ने किया

रसपान सुचारु

कभी अधरोँ को

सिला ही नही ।

प्रिय कैसी विसंगति

है जग की

बिना शूल के

फूल खिला ही नहीँ ।

42 टिप्‍पणियां:

बेनामी ने कहा…

kamal kr diya .
great chhand .

Vishnukant Mishra ने कहा…

fool to gandh bikher gaya
kitno ko hi nij gandh se moh liya

bramoron ne kiya utsarg parm
nig ko pankuriyon me bindh liya

jal deep mey pyara patang gaya'
apne to amar balidan kiya

sarvaswa samapn ka sabney
hm sabko hi sandesh diya.

aapki racna sundartm

राणा प्रताप सिंह (Rana Pratap Singh) ने कहा…

अदभुत!!!! ..जग में व्याप्त विसंगतियों का बेहतरीन चित्रण

ब्रह्माण्ड

कविता रावत ने कहा…

गणेशोत्सव और ईद की हार्दिक शुभकामनाएँ

पी.सी.गोदियाल "परचेत" ने कहा…

बीच से कोई कर्तन निकालना शायद उचित नहीं होगा क्योंकि पूरा छंद ही लाजबाब है !

अर्चना तिवारी ने कहा…

प्रभावशाली,सुंदर,लाजवाब रचना..

kshama ने कहा…

Bina shool ke dil bhi nahi khilta!

Anupama Tripathi ने कहा…

बिना शूल कभी फूलखिला ही नहीं -
बहुत सुंदर रचना -
कटु सत्य लिखा है आपने-
अद्वितीय-
शुभकामनाएं .

संगीता स्वरुप ( गीत ) ने कहा…

बहुत सुन्दर ..जीवन इन विसंगतियों के बीच ही जिया जाता है ..

RAJWANT RAJ ने कहा…

kvita ke sath sath geetatmkta ka vishesh gun hmahit hai agr usi bhav se kvita ka rsaswadn kiya jaye .bhut sunder .

वंदना शुक्ला ने कहा…

इस विडम्बना का नाम ही जीवन है....खूबसूरत रचना
वंदना

बेनामी ने कहा…

इस विडम्बना का नाम ही जीवन है....खूबसूरत रचना
वंदना

बेनामी ने कहा…

इस विडम्बना का नाम ही जीवन है....खूबसूरत रचना
वंदना

Prem Farukhabadi ने कहा…
इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.
Prem Farukhabadi ने कहा…

विसंगति

जिसको यहाँ कंचन रूप मिला
उसको प्रिय गेह मिला ही नहीं।
सुमनों को मिला रस गंध पराग
परन्तु सनेह मिला ही नहीं।
भ्रमरों ने किया रसपान सुचारु
कभी अधरों को सिला ही नहीं।
प्रिय कैसी विसंगति है जग की
बिना शूल के फूल खिला ही नहीं।

भाव गंभीर हैं. आपकी रचना सराहनीय है.

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

बिना शूल, फूल नहीं खिलता,
अब कहीं वह फूल नहीं मिलता।

Smart Indian ने कहा…

सुन्दर रचना।
शूल तो फूल के रक्षक हैं वैसे ही जैसे नेताजी के कमांडो।

मनोज कुमार ने कहा…

बहुत अच्छी प्रस्तुति। हार्दिक शुभकामनाएं!
काव्यशास्त्र (भाग-1) – काव्य का प्रयोजन, “मनोज” पर, आचार्य परशुराम राय की प्रस्तुति पढिए!

सम्वेदना के स्वर ने कहा…

पन्डित जी... आज आपकी इस रचना पर हमारा मौन प्रणाम स्वीकारें. नत हैं हम इस रचना के समक्ष!!

Urmi ने कहा…

भगवान श्री गणेश आपको एवं आपके परिवार को सुख-स्मृद्धि प्रदान करें! गणेश चतुर्थी की शुभकामनायें !
अद्भुत सुन्दर रचना!

राजभाषा हिंदी ने कहा…

बहुत अच्छी प्रस्तुति।

राष्ट्रीय व्यवहार में हिंदी को काम में लाना देश कि शीघ्र उन्नत्ति के लिए आवश्यक है।

एक वचन लेना ही होगा!, राजभाषा हिन्दी पर संगीता स्वारूप की प्रस्तुति, पधारें

arvind ने कहा…

प्रिय कैसी विसंगति

है जग की

बिना शूल के

फूल खिला ही नहीँ । ...khubasurat rachna.

संजय @ मो सम कौन... ने कहा…

ये विसंगतियां ही इस दुनिया को रोचक बनाती हैं, नहीं तो ये दुनिया बड़ी बोरिंग हो जायेगी।
सीरियसली कहें तो बहुत खूबसूरत छंद है, बधाई और
आभार स्वीकार करें।

VIJAY KUMAR VERMA ने कहा…

जिसको यहाँ कंचन रूप मिला
उसको प्रिय गेह मिला ही नहीं।
सुमनों को मिला रस गंध पराग
परन्तु सनेह मिला ही नहीं।
भ्रमरों ने किया रसपान सुचारु
कभी अधरों को सिला ही नहीं।
प्रिय कैसी विसंगति है जग की
बिना शूल के फूल खिला ही नहीं।

हर पंक्ति मन को छू लेने वाली ..विसंगतियों की इतनी सुन्दर संगति .. अद्भुत प्रयास ..बहुत बहुत बधाई ...

वीरेंद्र सिंह ने कहा…

प्रिय कैसी विसंगति
है जग की
बिना शूल के
फूल खिला ही नहीँ ।

सत्य वचन सर जी .....
ये प्रस्तुति बहुत ही उम्दा है.
इसके लिए आपको
धन्यवाद

देवेन्द्र पाण्डेय ने कहा…

जीवन की विसंगति को रेखांकित करती मार्मिक कविता।

ज्योति सिंह ने कहा…

प्रिय कैसी विसंगति

है जग की

बिना शूल के

फूल खिला ही नहीँ ।
is sach me peeda bhi hai sundarata bhi .man ko chhoo gayi baat .bahut sundar .

Parul kanani ने कहा…

sashkt shbd rachna!

हरकीरत ' हीर' ने कहा…

जिसको यहाँ कंचन
रूप मिला
उसको प्रिय गेह..
मिला ही नही ।

आपने तो यह कह के और छलनी कर दिया ......
ऐसा क्यों ....?
सुन्दरता के साथ ही दर्द का रिश्ता होता है क्या .....?

Kusum Thakur ने कहा…

"प्रिय कैसी विसंगति

है जग की

बिना शूल के

फूल खिला ही नहीँ ।"

बहुत ही खूबसूरत रचना है !

kumar zahid ने कहा…

प्रिय कैसी विसंगति

है जग की

बिना शूल के

फूल खिला ही नहीँ ।
अरुणेश मिश्र द्वारा 10:56 PM

kumar zahid ने कहा…

प्रिय कैसी विसंगति
है जग की
बिना शूल के
फूल खिला ही नहीँ ।

जीवन की यही ‘रस सरिता है ’।
हमारे बुजुर्ग कहते आए हैं ।
सुन्दर रचना।

वीना श्रीवास्तव ने कहा…

प्रिय कैसी विसंगति
है जग की
बिना शूल के
फूल खिला ही नहीँ

अनेक विसंगतियों के साथ ही जीवन भी चलता है और फूल की तरह खिलता भी है...बहुत बेहतरीन रचना...तारीफ के लिए शब्द नहीं हैं

मेरी नई रचना भी पढ़िएगा

sakhi with feelings ने कहा…

नमस्कार
फूल और कांटे का साथ जग जाहिर है ..बहुत अच्छा लिखा है अपने

Jesson Balaoing ने कहा…

I appreciate your lovely post.

Rohit Singh ने कहा…

कितनी खूबसूरती से वास्तविकता का वर्णण किया है आपने। कुछ मिलता है कुछ छूट ही जाता है। सही कहा ।

अनामिका की सदायें ...... ने कहा…

सच है यही की दुख के साथ सुख है कांटे के साथ फूल है.

सुंदर छंद.

Asha Joglekar ने कहा…

अतिशय सुंदर । आपकी रचना ने मुग्ध कर दिया ।

Dr.R.Ramkumar ने कहा…

भ्रमरो ने किया

रसपान सुचारु

कभी अधरोँ को

सिला ही नही ।
sunder abhivykti

शाहिद मिर्ज़ा ''शाहिद'' ने कहा…

पहली बार ब्लॉग पर हाज़िरी हुई है...
उत्कृष्ट रचनाएं पढ़ने को मिलीं...
सिलसिला शुरू करते हैं.

मिसिर ने कहा…

आ हा हा..........
अति सुन्दर छंद - रचना,
मार्मिक व्यंग्य भी और काव्य सौष्ठव भी
अद्भुत ,प्रसंशनीय काव्य!

Unknown ने कहा…

it is a very nice poem