रविवार, 24 अक्टूबर 2010

चित्तौड़ मे आयोजित मीरा महोत्सव पर एक छन्द । मीरा

विष दो या मुझे

अमरत्व ही दो

पति मान चुकी

घनश्याम को हूँ ।

इन बन्धनोँ मेँ

बँधना है नहीँ

सब त्याग चुकी

धन धाम को हूँ ।

अपना लिया है

अपने प्रिय को

मन दे चुकी

लोक ललाम को हूँ ।

मन मीरा बना

विष पीना पड़ा

अनुमान चुकी

परिणाम को हूँ ।

शनिवार, 9 अक्टूबर 2010

माँ की असीम शक्ति एक छन्द

अवगाहन मे उस

अमृत तत्त्व के

कौन कहे

अपरूप मे खोया ।

रश्मियाँ दिव्य

विकीर्ण हुई

तो लगा अनमोल

स्वरूप मे खोया ।

साध लिया जब

शाश्वत शक्ति ने

मानस बोध

अरूप मे खोया ।

धार मिली रसधार

अनन्त मेँ

अन्तर रूप

अनूप मेँ खोया ।

शनिवार, 18 सितंबर 2010

एक छन्द : त्यागने वाले मिले ।

रस रंग की बात

करो न अली !

बस रूप को

माँगने वाले मिले ।

सुख जानने वाले

अनेक मिले .

दुख देखकर

भागने वाले मिले ।

सुमनोँ को मिला

जहाँ गन्ध पराग

वहाँ कण्टक

मतवाले मिले ।

कितनी बड़ी त्रासदी

है जग मेँ

अपनाकर

त्यागने वाले मिले ।

शनिवार, 11 सितंबर 2010

एक छंद : विसंगति

जिसको यहाँ कंचन

रूप मिला

उसको प्रिय गेह

मिला ही नही ।

सुमनो को मिला

रस गंध पराग .

परन्तु सनेह

मिला ही नही ।

भ्रमरो ने किया

रसपान सुचारु

कभी अधरोँ को

सिला ही नही ।

प्रिय कैसी विसंगति

है जग की

बिना शूल के

फूल खिला ही नहीँ ।

गुरुवार, 2 सितंबर 2010

घनश्याम ; एक छंद

छंद में भगवान कृष्ण के प्रति अगाध प्रेम की अभिव्यक्ति है । अप्रैल 1998 ।

घनश्याम के अंक

लगी लगी मैं

कर पल्लव बेनु

बनी हुई हूँ ।

चिर साधिका हूँ

मनमोहन की

रति रंग की धेनु

बनी हुई हूँ ।

सखि ! नेह की डोर से

हूँ बँधी मैं

मनमोहन रूप

सनी हुई हूँ ।

स्वर , रश्मियों में

उन्मत्त हूँ मैं

पद पंकज रेनु

बनी हुई हूँ ।

शनिवार, 14 अगस्त 2010

ओ मेरे देश

ओ मेरे देश के सूत्रधार !

तुम लाल किले की

प्राचीर पर खड़े होकर

कब तक छोड़ते रहोगे

मूत्रधार ।

जिसमे अवगाहन करके

आम जनता

स्वतन्त्रता की वर्षगाँठ

मना रही है

और राजनीति

अफसरशाही के साथ

भ्रष्टाचार और

चरित्रहीनता का

च्यवनप्राश खा रही है ।

ऐसे मे कहना पड़ता है

कि

अपने देश मे

दो जंघाओं के बीच का

भूगोल

अर्थशास्त्र की बदौलत

इतिहास बनता है ।

यह भारतीय जनता है ।

रविवार, 8 अगस्त 2010

विभूति नारायण राय का अवसरवाद

महात्मा गाँधी अंतर्राष्ट्रीय विश्वविद्यालय के कुलपति भाई विभूति नारायण राय ने महिला साहित्यकारों को छिनाल कह दिया ।

इस मुद्दे पर महिलाओं को ही नहीं अपितु प्रत्येक विवेकशील का उत्तेजित होना स्वाभाविक है ।

कथित प्रगतिशील साहित्यकार कब दुर्गतिशील आचरण करने लगेंगे . जान पाना मुश्किल है । अज्ञेय . धर्मवीर भारती . अमृता प्रीतम . इस्मत चुगताई सहित अनेक साहित्यकार की जीवन कथा इसी व्यथा का संदेश है ।

राय ने किन महिला साहित्यकारों को लक्ष्य करके यह कहा . उनका मानस ही जानता होगा । उनका यह कहना कि आजकल महिलाओं मे एक दूसरे से आगे बढ़कर अपने को छिनाल सिद्ध करने की होड़ लगी है ।

हम यह नही समझ पा रहे हैं कि राय ने यह क्यों नही कहा कि पुरुष साहित्यकार एक दूसरे से बढ़कर महिलाओं को साहित्य मे स्थापित करने हेतु समर्पित हैं ।

कपिल सिब्बल एवं साहित्यकारों के घोर विरोध के चलते फिलहाल कुलपति की कुर्सी जाती देख राय ने माफी माँग ली ।
यही अवसरवाद है ।